रस किसे कहते है, परिभाषा, प्रकार (भेद) एवं उदाहरण

दोस्तों हिंदी व्याकरण में रस बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं। हिंदी काव्य पढ़ते वक्त हमें विभिन्न रसों की अनुभूति होती है। रसवादी आचार्यों ने रस को काव्य की अहम भूमिका माना है। उन्होंने रस को मुख्य माना है। इतना ही नहीं बल्कि रसों को काव्य की आत्मा भी कहा गया है। तो दोस्तों अगर आप भी रसों के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं तो हमारा आज का यह आर्टिकल आपके लिए ही है। क्योंकि आज के इस आर्टिकल में हम आपको रसों की परिभाषा, भेद प्रकार अंग स्थायी भाव के बारे में विस्तारपूर्वक बताने जा रहे हैं। 

आज के इस लेख में हम दसों रसों – श्रृंगार रस, हास्य रस, करुण रस, रौद्र रस, वीभत्स रस, भयानक रस, अद्धभुत रस, वीर रस, शान्त रस, और वात्सल्य रस की परिभाषा उदाहरण सहित जानेगें। दोस्तों जिस प्रकार आत्मा के बिना शरीर का कोई मूल्य नहीं उसी प्रकार रस के बिना काव्य भी निर्जीव माना जाता है। रस शब्द आनंद का पर्याय है। तो आइए अब हम रसों के बारे में विस्तार से जानते हैं –

रस किसे कहते है? (Ras kise kahte hai)

दोस्तों जैसा कि हम ऊपर पढ़ चुके हैं कि रस शब्द का अर्थ आनंद होता है। साहित्य शास्त्र मे रस का अर्थ अलौकिक या लोकोत्तर आनंद होता हैं। दूसरे शब्दों में जिसका आश्वासन दिया जाये वही रस है। रस का अर्थ आनन्द है अर्थात् काव्य को पढ़ने सुनने या देखने से मिलने वाला आनन्द ही रस है। रस की निष्पत्ति विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से होती है। 

रस की परिभाषा (ras ki paribhasha)

दोस्तों जब कभी भी हम किसी काव्य कहानियां नाटक को पढ़ते हैं तो हमें एक प्रकार के आनंद की अनुभूति होती है। इस आनंद को ही रस कहा गया है। सरल शब्दों में समझें तो, काव्य के पढ़ने सुनने अथवा उसका अभिनय देखने मे पाठक, श्रोता या दर्शक को जो आनंद मिलता है, वही काव्य में रस कहलाता है। रस के कुल 10 प्रकार होते हैं। यह कुछ इस प्रकार है –

10 प्रकार के रस एवं उनके स्थायी भाव 

1. श्रृंगार रस का स्थायी भाव =        रति

2. हास्य रस का स्थायी भाव =         हास 

3. करूण रस का स्थायी भाव =       शोक

4. रौद्र रस का स्थायी भाव =           क्रोध 

5. वीभत्स रस का स्थायी भाव =      जुगुप्सा 

6. भयानक रस का स्थायी भाव =     भय 

7. अद्धभुत रस का स्थायी भाव =     विस्मय 

8. वीर रस का स्थायी भाव =           उत्साह 

9. शान्त रस का स्थायी भाव =         निर्वेद 

10. वात्सल्य रस का स्थायी भाव =  वत्सल

आचार्य भरत के अनुसार 8 रस माने गए हैं। परवर्ती आचार्य द्वारा शांत रस को स्वीकृति देकर को नौ रसों की पहचान निश्चित की गई थी। काव्य मे महाकवि सूरदास ने वात्सल्य से संबंधित मधुर पद लिखे, तो एक अन्य  नया रस वात्सल्य रस की स्थापना (जन्म हुआ)। 

रस के चार अंग भी होते हैं जो कुछ इस प्रकार से हैं – 

1. स्थायी भाव 

काव्य कहानियां नाटक को पढ़ने के बाद जो भाव मानव हृदय में स्थायी रूप मे विद्यमान रहते हैं उन्हें स्थाई भाव कहा जाता है। 

2. विभाव

स्थायी भाव को जगाने वाले और उद्दीप्त करने वाले कारक को विभाव कहा जाता है। विभाव भी दो प्रकार के होते है— (क) आलम्बन (ख) उद्दीपन।

3. अनुभाव

स्थायी भाव के जाग्रत होने तथा उद्दीप्त होने पर आश्रय की शारीरिक चेष्टाएँ महसूस की जाती है। यह अनुभाव कहलाती हैं। उदाहरण वन शेर को देखकर डर के मारे कांपने लगना, लगाना आदि। अनुभव भी पांच प्रकार के होते हैं– 1. कायिक 2. वाचिक 3. मानसिक 4. सात्विक 5. आहार्य। 

4. संचारी भाव

संचारी भाव को विभा चारी भाव भी कहा जाता है। यह वो भाव होते हैं जो जाग्रत स्थायी भाव को पुष्ट करने के लिए कुछ समय के लिए जाकर लुप्त हो जाते हैं। उदाहरण –  वन शेर को देखकर भयभीत व्यक्ति को ध्यान आ जाये कि आठ दिन पूर्व शेर ने एक व्यक्ति को मार दिया था। यह स्मृति संचारी भाव होगा।

उदाहरण सहित दसों रस के भेद (ras ke udaharan)

श्रृंगार रस की परिभाषा एवं उदाहरण 

श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति हैं। इस रस में नर और नारी के बीच प्रेम की अनुभूति होती है। इस रस मे नायक-नायिका के संयोग (मिलन) की स्थिति का वर्णन होता हैं। 

श्रृंगार रस का उदाहरण ” बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।

सौंह करें, भौंहनि हँ सें, देन नट जाय।।

वियोग ; नायक-नायिका के बिछड़ने या दूर देश मे रहने की स्थिति का वर्णन, वियोग श्रृंगार की व्यंजना करता हैं।

उदाहरण; ” भूषन बसन बिलोकत सिय के

प्रेम विवश मन कम्प, पुलक तनु नीरज नीर भये पिया के।”

यहाँ आलम्बन सीता तथा आश्रय राम है। सीता के आभूषण, वस्त्र आदि उद्दीपन हैं। कम्पन, पुलक, आँख मे आँसू अनुभाव हैं। दर्द, स्मृति भाव हैं। 

“राम के रूप निहारति जानकी, कंगन के नग की परछाई।

याते सबै सुधि भूलि गई, कर टेकि रही पल टारत नाहीं।।”

हास्य रस की परिभाषा एवं उदाहरण

जब भी किसी भी काव्य, कथन या लेख को पढ़कर हँसी उत्पन्न होती हैं, वहाँ हास्य रस होता हैं। जहाँ किसी व्यक्ति की विकृत (चटपटी) बातें आवेश एवं बनावट, चेष्टा आदि का वर्णन हो उन्हें भी हास्य रस के अंतर्गत गिना गया है। 

हास्य रस का उदाहरण 

कहा बंदरिया ने बंदर से, चलो नहाए गंगा। 

बच्चों को छोड़ेंगे घर में, होने दो हुड़दंग।।

” जब धूमधाम से जाती है बारात किसी की सज-धज कर।

मन करता धक्का दे दूल्हे को, जा बैठूं घोड़े पर।

सपने मे ही मुझको अपनी, शादी होती दिखती हैं। 

वरमाला ले दुल्हन बढ़ती, बस नींद भी खुल जाती हैं। 

करुण रस की परिभाषा एवं उदाहरण

जब भी किसी का भी कथनी और लेख को पढ़कर शो की उत्पत्ति होती है वहां पर करुण रस होता है। 

करूण रस का उदाहरण 

“करि विलाप सब रोबहिं रानी। 

महाविपति किमि जाइ बखानी।।

सुनि विलाप दुखद दुख लागा।

धीरज छूकर धीरज भागा।।

इसमे रानियाँ आश्रय, राजा दशरथ की मृत्यु की सूचना उद्दीपन हैं। आँसू बहाना, रोना, विलाप करना, अनुभाव और विवाद, दैन्य, बेहोशी आदि संचारी भाव हैं। 

“अभी तो मुकुट बँधा था माथ

हुए कल ही हल्दी के हाथ। 

खुले भी न थे लाज के बोल

खिले भी न चुम्बन-शून्य कपोल।

हाय! रुक गया यह संसार, 

बना सिन्दूर अंगार।।”

रौद्र रस की परिभाषा एवं उदाहरण

रौद्र रस का स्थाई भाव होता है क्रोध। जब भी कभी-कभी काव्य कथन या लेख को पढ़कर क्रोध की उत्पत्ति होती है वहां पर रौद्र रस प्रकट होता है। 

रौद्र रस का उदाहरण 

” श्री कृष्ण के सुन वचन, अर्जुन क्रोध से जलने लगे।

सब शोक अपना भूलकर, करतल युगल मलने लगे।।

संसार देखे अब हमारे शत्रु रण मे मृत पड़े।

करते हुए यह घोषणा, वे हो गए उठकर खड़े।।”

” सुनत लखन के वचन कठोरा।

  परशु सुधारि धरेउ कर घोरा।

 अब जनि दोष मोहि लोगू,

 कटू वादी बालक वध जोगू।।”

वीर रस की परिभाषा एवं उदाहरण

वीर रस का स्थायी भाव उत्साह होता है। जब भी कभी किसी का भी कथन है लेकिन को पढ़कर मानव हृदय में देश भक्ति तथा उत्साह की उत्पत्ति होती है तो वहां पर वीर रस प्रकट होता है। युद्ध मे विपक्षी को देखकर, ओजस्वी वीर घोषणाएं या वीर गीत सुनकर तथा उत्साह वर्धक कार्यकलापों को देखने से यह रस जाग्रत होता हैं।

वीर रस का उदाहरण 

“वह खून कहो किस मतलब का

जिसमें उबाल का नाम नहीं।

वह खून कहो किस मतलब का

आ सके देश के काम नहीं।”

भयानक रस की परिभाषा एवं उदाहरण

भयानक रस का स्थाई भाव भय होता है। तो जब भी किसी का भी कथन या लेख को पढ़कर मानव हृदय में भय की उत्पत्ति होती है तो वहां पर भयानक रस प्रकट होता है। लेकिन या काव्य में भयंकर प्राकृतिक दृश्यों को देखकर अथवा प्राणों के विनाशक बलवान शत्रु को देखकर उसका वर्णन सुनकर भय उत्पन्न होता हैं। 

भयानक रस का उदाहरण 

“एक ओर अजगर सिंह लखि, एक ओर मृगराय।

विकट वटोही बीच, पर्यो मूरछा खाय।।

” हाहाकार हुआ क्रन्दनमय कठिन वज्र होते थे चूर।

हुए दिगंत बधिर भीषण रव बार-बार होता था क्रूर।।”

वीभत्स रस की परिभाषा एवं उदाहरण

वीर रस का स्थायी भाव जुगुप्सा होता है। काव्य या लेखन में जहां पर दुर्गन्धयुक्त वस्तुओं, चर्बी, रुधिर, आदि का ऐसा वर्णन हो, जिससे मन में घृणा हो वहाँ वीभत्स रस होता है।

वीभत्स रस का उदाहरण 

” कहुँ धूम उठत बरति कहूँ चिता,

   कहूँ होते रोर, कहूँ अर्थी धरि हैं।

   कहूँ हाड़ परों, कहूँ जरो, अधजरो माँस,

   कहूँ गीध काग मांस नोचत पीर अहैं।।

” सिर पर बैठो काग आँखि दोउ खात निकारत।

  खींचित जीभहिं स्यार अतिहि आनन्द उर धारत।।

  गिद्ध जाँघ कह खोदि-खोदि के मांस उपारत।

  स्वान अंगुरिन काटि के खात विरारत।।”

अद्भुत रस की परिभाषा एवं उदाहरण 

अद्भुत रस का स्थाई भाव होता है आश्चर्य या विस्मय। जब भी किसी का भी आलेखन को पढ़कर मानव हृदय में विस्मय या आश्चर्य का भाव प्रकट होता है तो वहां पर अद्भुत रस की उत्पत्ति होती है। 

अद्भुत रस का उदाहरण 

“बिनु पद चलै सुनै बिनु काना, 

 कर बिनु कर्म करै विधि नाना।

 आनन रहित सकल रस भोगी, 

 बिनु वाणी वक्का बड़ जोगी। “

शांत रस की परिभाषा एवं उदाहरण 

शांत रस का स्थायी भाव निर्वेद है। जहां पर काव्य में संसार की निश्चित एवं दु:ख की अधिकता को देखकर ह्रदय में विरक्ति उत्पन्न होती है। इस प्रकार के वर्णन मे शांत रस होता हैं। 

शान्त रस का उदाहरण 

“चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय।

दुइ पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।।” 

वात्सल्य रस की परिभाषा एवं उदाहरण

वात्सल्य रस का मूल भाव है वात्सल्य प्रेम। जब भी किसी का भी में शिशु के प्रति प्रेम व्यक्त किया जाता है तो वहां पर वात्सल्य रस की उत्पत्ति होती है। जहाँ शिशु के प्रति प्रेम, स्त्रेह, दुलार आदि का प्रमुखता से वर्णन किया जाता है वहाँ वात्सल्य रस होता है। सूरदास द्वारा वात्सल्य रस का बड़ी खूबसूरती से निरूपण किया गया है। 

वात्सल्य रस का उदाहरण 

“धूरि भरे अति सोभित स्यामजू, 

तैसि बनी सिर सुन्दर चोटी।।”

“जसोदा हरि पालने झुलावैं।

हलरावैं दुलराय मल्हावैं, जोइ कछु गावैं।।”

“मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो,

ख्याल पैर सब सखा मिली मेरे मुख लपटायो।”

निष्कर्ष 

तो दोस्तों यह तो हमारा आज का आर्टिकल जिसमें हमने आपको रस किसे कहते है और सभी रसों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी और साथ ही साथ उनके उदाहरण भी बताएं। उम्मीद करते हैं कि आपको आज का यह आर्टिकल पसंद आया होगा। धन्यवाद।

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